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3 Comments

  1. avi

    मुंह खोलने पर चरित्र प्रमाणपत्र थमाने वाले बंबई पूना दिल्ली नोयडा में भी नही चूकेंगे और बच्चे पैदा करने की मशीन अब पहाड़ी स्त्री रही नही और नही रहा पहनावे या खानपान पर रोकटोक का दौर। सुंदरचंद ठाकुर जी के कुछ दिन पहले छपे लेख “आओ अमीर बनें” में जवाब मिलता दिखता है कि हम जिसे संपन्नता मान बैठे हैं वह भ्राामक है। असली संपन्ननता भीड़ भाड़, प्रदूषण और जहरीले मिलावटी खाद्य पदार्थों से दूर पहाड़ों पर ही है। हर पहाड़ी जिले में पलायन आयोग दफ्तर खोलकर भी बैठ जाय फिर भी बिना मानसिकता बदले पलायन पर रोक नही लगेगा। रही विकास कार्यों की बात वह तभी होंगे जब वोटर अधिक होंगे।

  2. Suraj singh

    उत्तराखण्ड मे सभी जगह ऐसे ही है इस चीज का मैं भी विरोध करता हूँ
    लेकिन मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं क्या आपके यहा इससे विपरित है! ये बात भी ध्यान देने वाली है. कि ये सब करवाने वाली भी एक औरत ही होती है तो हम दोष किसे दे आजकल तो युवा पीढ़ी ना तो ये छुवा-छूत मानती है और ना जात-पात
    और रही कपड़े पसंदीदा कपड़े पहनने या नहीं पहनने उसे यहा के लोग संस्कृति(संस्कार) कहते है वो सब बताने वाली भी एक औरत ही होती है बहु कुछ भी कर ले उसे डांटने वाली कौन होती है सास जी भी एक औरत है

    मेरे ये बात अगर किसी को कहीं से बुरी लगी तो माफी
    मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है कि जिससे एक औरत की मान का अपमान हो क्योंकि मेरी माँ भी एक औरत ही है

  3. अभय पंत

    बस यही तो कारण हैं, और इसीलिए औरतों का ठेठ गांवों से पलायन न्यायोचित भी है।

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