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35 Comments

  1. Manoj Chand

    Too shameful act ! Respect for each other Varna was missing which is the fine thread of binding our society . This respect has to be restored .

  2. A R Arya

    सदियों से हम लोग कितना अपमान सहते सा रहे हैं। किसी ने भी पीछे झाकने की कोशिश नहीं की। जब तक हम अलग अलग जातियों में बटे रहेगें तब तक ऐसी घटनाएं भविष्य में भी होती रहेंगी क्योंकि ऐसी घटना होने के कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते हैं लेकिन कोई भी इसका कारण नहीं ढूढते हैं। इसका मुख्य कारण हमारे समाज का अनेकों जातियों, गुटों टुकड़ों में बटना।जब तक हम सभी एकता में नहीं रहेंगे ऐसी कायरता पूर्ण जातीय घटनाए होती रहेंगी ।हम सभी को अलग अलग जातियों में न बट कर सिर्फ अनुसूचित जाती में रहकर एकता में रहना चाहिए नहीं तो हमारा भी एक दिन नम्बर आ सकता है। क्योंकि उत्तराखंड में वैसे भी हमारी जनसंख्या 20% से 30%के बीच में ही है और हमें किसी अन्य जातियों का moral सपोर्ट भी नहीं है।
    इसलिए यदि हम अलग अलग जातियों में बट कर सिर्फ एक ही जाति जिसे सिर्फ अनुसुजित जाति ही कहे, में संगठित होकर एक साथ रहें तो तभी उन गन्दी मानसिकता वालो का मुकाबला किया जा सकता है।

  3. Avinash Gauniyal

    ओह! हमारे हाथ भी सने हैं खून से और मैं सोचता था कि हाशिमपुरा और भागलपुर जैसी घटनाओं के लिये उत्तराखंड आखिरी स्थान है।

  4. मानवता

    जातिवादी घिनौने-हिंसक हत्याकांड के शिकार सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि एवं पीड़ित परिवारों के प्रति मार्मिक संवेदनाएं।??? सबसे बड़ा धर्म मानवता है और सबसे बड़ी जाति मानवीयता।???

  5. RS Manral

    जातिवादी घिनौने-हिंसक हत्याकांड के शिकार सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि एवं पीड़ित परिवारों के प्रति मार्मिक संवेदनाएं।??? सबसे बड़ा धर्म मानवता है और सबसे बड़ी जाति मानवीयता।???

  6. शून्य

    वैसे #जातिवादीयों की छोड़ ही दो #लिब्रान्डू भी उस पहले मृतक #खीमानन्द की हत्या को जायज ठहराते नजर आ रहे हैं और ये न्यूज ब्लॉग भी क्योंकि वो ब्राह्मण था स्वर्ण था जिसकी नृशंस हत्या की गयी एक समूह द्वारा की गयी .. और उसके बाद जो हुवा वो क्या पहली हत्या से अलग था ?? क्या पहली हत्या तड़ी में एक जातीय-समूह ने नहीं की ??? क्या पहली हत्या के बाद हुवी हत्यायें उस पहली हत्या के जनाक्रोश में या प्रतिउत्तर में नहीं हुवी ??? अगर वो 14 हत्याओं में जातिवादी एंगल ढूंढा जा रहा हैं तो उस पहली हत्या में क्या वो मौजूद नहीं था ???

  7. Pankaj

    Aaj bhi aisa hi hota hai uttarakhand mai log cast ke dambh mai kisi ko bhi castism abusive language use krte haI har jagah castism hai uttarakhand mai jamin kharidne bechne se le kar rent room dene pani k dhare use krne mai log jati dekh kr nimantran dete hai chahe wo neighbours hi kyu na ho schools mai bhi wahi hal hai. Mai khud apni aankho se dekha hu

  8. गौरव नेगी

    ये जातिवाद का जहर इतना खतरनाक है की इसका कोई तुरत इलाज भी नहीं
    स्वयं के श्रेष्ठ होने की भावना ने इसे और बढ़ावा दिया है,
    अधिकांश युवा पीढ़ी भी इस श्रेष्ठता से ग्रसित नजर आती है

  9. Rangey Sumer

    कब तक ये जातिय दमन चलता रहेगा??? बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है कि ये जातीय दमन इसलिए हैं कि ये पिछड़े वर्ग हिन्दू समाज के अंग हैं या फिर हिन्दू समाज से अलग है? मेरे ख्याल ये शोषित पिछड़ा वर्ग तथाकथित रुप से तो हिन्दू समाज जुड़ा हुआ है परंतु भावनात्मक और सामाजिक रुप से बिल्कुल अलग है इसिलिए इस समाज का सदेव दमन होता रहा है और होता रहेगा क्योंकि जब तक ये शोषित पिछड़ा वर्ग हिन्दू समाज से भावनात्मक और सामाजिक रूप से नही जुड़ेगा तब तक इनके साथ अत्याचार होता रहेगा ओर तथाकथित उच्च वर्ग इन पिछड़ो को अपने साथ जोड़ेगा नहीं। इसी वजह से इन शोषितो का शोषण होता ही रहेगा। अपने अस्तित्त्व को बचाने के लिए इन शोषित पिछड़े वर्गों को हिन्दू समाज से अलग होकर इनके समस्त रीति रिवाजों को छोड़कर अपनी अलग पहचान बनानी पड़ेगी। तभी जाकर इस वर्ग का अस्तित्त्व बचा रहेगा क्योंकि इन पर अत्यचार को बाकी समाज ज्यादा तवज्जों भी नहीं देता है और ना ही साथ देता है सिवाए चुनाव के दौरान वोट के अतिरिक्त।

  10. नागेन्द्र कुमार

    मुझे तो इसमे कही भी जातिवाद नजर नही आ रहा, जब कुछ लोगो को मन्दिर मे आस्था थी तो उसका सम्मान करना चाहिए था.

  11. राघव

    ये काफल ट्री साइट कुछ घटनाओं को जातिवाद की चासनी में लपेट कर उत्तराखंड में भी जातिविभेद पैदा कर शान्त समाज में विघटन पैदा करने का प्रयास कर रहा है ।ताकि सनातन एकता को उत्तराखंड में भी तोड़ा जा सके । इससे सावधान रहने और इसे हतोत्साहित करने की आवश्यकता है ।

  12. राघव

    इस घटना का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है । इस प्रकार की पोस्टें 2014 के बाद से ही क्यों की जा रही हैं यह पाठकों को विचार कर लेना चाहिए ।

  13. Ashutosh Kumar

    इस वेबसाइट की हिंदुत्व विरोधी सोच बहुत पहले से नोट कर रहा हूं लेकिन फिर भी ज़्यादातर पोस्ट देखता हू क्योंकि समाज में हर किसी के नजरिए को देखना पड़ेगा
    ज़रूरी नहीं कि सबकी सोच एक जैसी हो
    शायद इस वेबसाइट के एडमिन बहुत बड़े वाले कांग्रेसी है

  14. Gopendra Gangwar

    शर्मनाक एक मानव के प्रति दूसरे मानव का हिंसकऔर अपमानजनक व्यवहार। मानव के जन्म से लेकर आज तक हम विकसित तो हुए लेकिन मानव नहीं बन पाए।

  15. राजेन्द्र सिंह

    इस जातिवाद ने पहाड़ों में ही नही सभी जगह पूरे भारतवर्ष में गहरी पैठ बना रखी है इसकी नींव बहु गहरी है यही कारण है कि हिंदु कभी एक नही हो सकता, कुछ निम्नवर्ग गरीब तबके के लोगों ने तो धर्मान्तरण भी करवा लिया है कई तो ईसाई बन गए या कई लोगों ने बौद्ध धर्म अपना लिया है बाकी यही हाल रहा तो बाकी लोग इस्लाम कबूल कर लेंगे समय विकट आ रहा है धर्म के नाम पर जो ऐसी हरकतें करते है उनका भी बचना मुश्किल है बक्त के साथ जो नही बदलता उसे बक्त बदल देता है। अभी भी समय है हिंदुओं को संगठित होने का अगर इसी जाती पाती में उलझे रहे तो टूट कर बिखरते देर नही लगेगी दूसरे आक्रांता हिंदुओं का नाश कर देगी।

  16. वीरेंद्र विष्ट

    जो भी हुआ वह दुखद था। किसी भी समाज के बड़े बूढ़ो को हालत संभालने चाहिए थे । झूठे जातीय वैमनस्य के कारण यह घटना हुई। दोनों पक्षों मे से किसी ने भी धैर्य और समझदारी का परिचय नहीं दिया। इसमे दोनों पक्ष अपराधी हैं।
    1. गाँव मे यदि परंपरा है कि स्थानीय देवता के सम्मान में दुल्हा दुल्हन या अन्य कोई भी देवस्थान के आस पास से अपने घोड़े या पालकी से उतर कर थोड़ी दूर तक पैदल चलते हैं, यदि यहाँ भी वे जनभावना का आदर करते हुहे दुल्हे को थोड़ी दूर पैदल चला लेते तो बात इतनी बदती नहीं।
    2. यदि इस बात को उस गाँव के सवर्ण ही समझदारी दिखाते और बात न बढ़ाते और इसका निर्णय देवता पर छोड़ देते तो भी कई जाने न जाती।
    3. जब एक ब्राह्मण ने दूल्हे को डोली से गिरा दिया तो यदि बारात के बड़े बूढ़े परिस्थिति कि गंभीरता को समझ कर बात को न बढ्ने देते और नाहक उस ब्राह्मण फौजी कि हत्या न होने देते तो भी बात संभाल जाती। लेकिन जब इतनी बात बढ़ जाती है तो ग्रामीण परिवेश को समझने वाले लोग जानते हैं कि फिर इस आग को रोकना कितना मुश्किल हो जाता हैं और हुआ भी वही। अग्नि भड़क गई और और अपना विनाशक रूप दिखा ही गई

    सभी 15 मृतकों कि आत्माओं को ईश्वर शांति दें और आगे ऐसी घटनए ना हों इसके लिए सभी समाज के लोग सजग रहें। जात पात के विभाजन कि जगह एक हों और न्याय का साथ दें जाती का नहीं।

  17. कमल लखेड़ा

    यह घटना हिंसा – प्रतिहिंसा की है । इसके अलावा यहां यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जातीय भेदभाव तो है, लेकिन प्रत्येक अपराध कानून की कसौटी पर ही कसा जाना चाहिए । पिछली बुरी यादों को ढोते रहने से वर्तमान और भविष्य नहीं सुधरेगा ।

  18. Harish Ram

    उत्तराखण्ड में सवर्ण कुछ ज्यादा ही जातीय अहंकार में रहते है। आज भी कई जगह ऐसी घटनाएं होती रहती है उत्तराखण्ड और पूरे भारत वर्ष में जो कि इस देश के लिए बड़ी शर्मनाक चीज है। लोगो को समझना चाहिये और ऐसी बातों को त्याग कर भेदभाव की भावना छोड़नी चाहिए।

  19. के एल आर्य

    बहुत ही दर्द भरी, मन को झकझोर कर देने वाली दास्तान।
    इसमेँ मानवता कहीं भी नहीं दिखती।
    एक बात जानना चाहुंगा कि क्या सभी जातियों के लोगों के दुल्हा दुल्हन को मन्दिर के पास पाल्की या घोड़े से उतरना होता है या केवल दलित वर्ग के लोगों के लिये यह परम्परा मान्य है।
    अगर, केवल दलित वर्ग को लागू है, तो जातिवाद और दलितों का एक तरह का शोषण है। इस परिवेश मेँ हो सकता कि आज के शिक्षित काल मेँ, इस वर्ग के लोगों ने इस शोषण वादी परम्परा को आगे अपनाने मेँ मना किया हो, और उसका खामियाजा यह दर्द भरा, मानवता के नाम पर कलँक लगा देने वाली घटना घटी।
    भगवान इस घटना मेँ अपनी जान गवां चुके सभी दिवँगत आत्माओं को शांति प्रदान करें। ऊँ शान्ति।

  20. MAadhav

    इस पोस्ट में इकतरफा बात कही गयी है, जो हुआ गलत हुआ पर उसका मतलब यह नहीं कि दलितों ने सही किया, उन्होंने सबसे पहले बद्रीनाथ भगवान का अपमान किया, बाद में जब फ़ोजी ने विरोध किया तो उसे जान से मार दिया, दलितों ने जब अपनी मौत को खुद निमंत्रण दिया.तो फ़िर बाद में मातम कैसा! ये बात अलग है कि काफल ट्री भी अंधा हो गया है जिसने तर्क करने की क्षमता खो दी है!सत्य यह है कि दलित समाज को कभी अपनी गलतियों का अहसास नहीं हुवा, उसे राजनीतिक रंग देकर शोषण शब्द से जरुर पालित-पोषित किया गया!

  21. फकीर चंद्र बरेली

    कैफलता कांड के इस जातिवादी घिनोंने हिंसक हत्याकाण्ड के शिकार सभी पुण्य आत्माओं को भाव भीनी श्रद्धांजलि एवम पीड़ित परिवारों के प्रति मार्मिक सम्बेदना ।

  22. रवीन्द्र सिंह बसेडा़

    कफल्टा कांड जैसे कांड पर काफल ट्री के वामपंथी, ईसाईयों के छद्म ईसाई यानि दलित एट्रोसिटी नरेटिव को जस्टिफाई करने को प्रगतिशील हस्तक्षेप मानने की खुशफहमी में हैं।
    पर एक कफल्टा के बाद कितने ही निर्दोष इस एट्रोसिटी नरेटिव की फैलाई घृणा और सामाजिक तनाव के बीज बो कर निर्दोष लोगों को झूठे एट्रोसिटी एक्ट में फंसाने का सबब बनी है।
    पहाड़ में माओवाद और मिशनरी के लिए जमीन तैय्यार करने वाले कुबुद्धिजीवियों का सशस्त्र विरोध किया जायेगा, सनद रहे।
    जगत राम को हरिसिंह ने बचा लिया, पहली हत्या खीमानंद की हुई, प्रतिशोध में हुई कार्यवाही को दलित अत्याचार व सिविक रैसिस्टेंस मानकर गलैमराईज करें और दूसरे पक्ष को शर्मसार होने को कहने से कौन सा रिप्रोचमेंट और सामाजिक सद्भाव बढा रहा है लेखक?

  23. संजीव मोहन

    जब जब, जो जो, किसी की धार्मिक भावनाओं को समझेंगे नही, सम्मान करेंगे नही, अपितु स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के की चेष्टा में, सामने वाले की भावनाओं को ठेस पहुंचाते रहेंगे, ऐसी निरंकुश घटनाओं से सदैव सामना करना अपरिहार्य है।

  24. B.p.singh

    जहां तक मैंने सुना है अपनी दादी से, वह यह है कि उस गांव के अंदर कोई भी नीची जाति का ब्यक्ति पालकी या घोड़ी पर बारात नही लेकर जा सकता था, पालकी या/ घोडी पर सिर्फ उस ज़माने मैं ठाकुर ओर ब्ररामणः ही उपयोग कर सकते थे ,जब उस गांव वालो को पता चला कि बारात पालकी मैं आ रही है तो फिर ये सब हुआ।

  25. Govind

    यह कहानी आधी अधूरी है।

  26. Sunder lal

    गुलामी मानसिकता से होतीं है।कभी भी अपने आप को कमजोर मत समझो। हम पहाडी है। हमारा अपना culture है। ये लोग अगर बहादुर होते तो 1000 साल मुस्लिम व 300 साल अगेजो के गुलाम नही रहते । अपने बच्चों को पढाओ- लिखाओ आगे बढाओ ।शिक्षा से ही विकास होगा ।

  27. Sunder

    बहुत दुखद घटना थी ।ईस मै शहीद हुवे लोगों शत-शत नमन ।

  28. कुंदन सिंह

    गलत तथ्य लिखे गये है। वास्तविकता वह नही है जो लिखी गई है।

  29. Amar

    शायद इस घटना का सटीक विश्लेषण नहीं किया गया है। यह भी हो सकता है कि पोस्ट डालने वाले को घटना के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है अथवा उस व्यक्ति और संस्था का इरादा नेक नहीं है। यह स्वार्थ लोभ के वशीभूत होकर समाज को बांटने और आपसी भाईचारे को तहस नहस करके देवभूमि की एकता, अखंडता और पवित्रता को बर्बाद करने की एक साज़िश है। ऐसे तथाकथित असामाजिक तत्वों, व्यक्तियों एवं संगठनों से सावधान रहने की जरूरत है। जिससे देवभूमि की गरिमा को अखंड और अक्षुण्ण बनाए रखने में मदद् मिल सके।

  30. महावीर ध्यानी

    पोस्ट डालने वाले को पूरी जानकारी नही है। खीमानंद के मरने के बाद महिलाओं ने किया था यदि उस दिन पुरुष गांव में होते तो शायद एक भी बराती नही बचता। ऐसी घटनाएं नही होनी चाहिये। इसलिये गलत जानकारी न डाले। तो ही अच्छा है।

  31. Mukesh

    सभी को मेरा सदर प्रणाम,
    मैंने बहुत से लोगो के कमेंट पढ़े ,किसी ने लिखा हमे अनुसूचित जाति के रूप में एक रहना चाहिए ,किसी ने लिखा हिन्दू होकर एक रहना चाहिए,किसी ने मार्मिकता दिखाने का प्रयास किया,

    तो मैं कहना चाहूंगा यह किसी ने क्यो नहीं लिखा हमें हिन्दू ,मुस्लिम, दलित , अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति आदि के रुप में न रहकर इंसान बन कर रहना चाहिए, क्यों हम पढ़े लिखे लोग भी ऐसी बात करते है , इंसान को इंसान बनाओ जाति वाला सिस्टम नई पीढ़ी के सामने आने ही मत दो।सब मिलकर आंदोलन करो की किसी भी प्रकार का जाती प्रमाण पत्र नहीं बनाएंगे और न ही सरकार को अब ऐसा करना चाहिए , हम सब सभ्य समाज के लोग है और इंसानियत पर चलना चाहते है तो सरकार को प्रमाण पत्र ही बंद कर देना चाहिए जिससे न जाती होगी और न ही धर्म, अपनी मर्ज़ी से कोई किसी की भी उपासना करें ,पर उसके पास इस प्रकार का सरकारी प्रमाण पत्र नहीं होना चाहिए,इस से यह होगा कि आने वाली 2 या 3 पीढ़ी में यह सब अपने आप ही खत्म हो जाएगा।

  32. कमल

    क्रिया की प्रतिक्रिया……
    सबसे पहले यह कि जब गांव मे देव् सम्मना की परंपरा थी तो उसका सम्मान होना चाहिए..
    @2… एक पालकी जो कि सम्भवतः 2 या 4 लोग उठाकर चलते है…”तो एक ब्यक्ति मैं इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह पालकी उलट दे..
    @३…यदि पालकी उलट भी दी थी तो यह कहा कि न्याय था कि सब बारातियों ने उक्त ब्यक्ति की हत्या कर दी…जो कि ब्रह्ममण जाती का था…
    @४….यहां पोस्ट मैं एक लाईन लिखी गई है कि …अब बदला लेने की बारी ब्राहम्णो व ठाकुरों की थी….मैं इस बात से पुर्णत्या आहत हूं…. क्योंकि जिसकी हत्या पहले की गई थी वो भी मनुष्य ही था……ना कि जाति का पिटारा…..
    @५.. यदि उक्त ब्यक्ति की हत्या किसी अन्य जाती के बारातियों द्वारा की गई होती ….तो भी परिणाम यही होता जो कि उस समय घटित हुआ….
    अब…. इस घटना को जातीय मतभेद के तराजू मैं तौलकर लेखक क्या ब्यक्त करना चाहता है …सायद सबके समझ मे आ गया होगा..
    @७ …अंत मैं मानवता के नजरिये से देखा जाए तो जितने लोगो ने इस घृणित कांड अपना सहयोग दिया यह कृत्य उन सब के लिए मानवता के नाम पर कलंक है न कि जातीय दंभ पर…..जो मैं लोगो की पोस्ट पड़ कर महसूस कर पा रहा हूँ….

  33. Karan Devraj Bora

    मेरी नजर में ये कोई जातिय हत्याकांड नहीं बल्की दोनो तरफ के लोगो के भीतर छोटे विवाद से पनपे अहम और अहंकार का नतीजा है, इसे जातीय रंग देना बिल्कुल गलत है, हर हर महाॅदेव शिव-शम्भु।

  34. PrakashChandra

    कफल्ट्टा कांड के संदर्भ में पोस्ट को देखकर प्रत्येक व्यक्ति ने अपने अपने विचार व्यक्त किए। लेकिन वास्तव में उपरोक्त विषय ही अधूरा है। पोस्ट में पूरी जानकारी दी ही नहीं गई है। जानकारी अनुसार विवाद यहां पर मंदिर को लेकर नहीं बल्कि तथाकथित अपने को श्रेष्ठ मानने वाले (उच्च जाति) लोगों के गांव से गुजरने वाले रास्ते से दूल्हा ,घोड़े या डोली में सवारी न करते हुए पैदल चलने का था। जिसको पोस्ट में नहीं दर्शाया गया। जहां तक मंदिर की बात है। वह तो घटनास्थल से काफी दूरी पर रास्ते से हटकर है। वास्तविकता है की उपरोक्त घटना हमारे समाज में व्याप्त अंधविश्वास व अज्ञानता का जीता जाता उदाहरण है।
    इन परिस्थितियों में हमारा समाज कभी भी प्रगति नहीं कर सकता यह सत्य है।

  35. अशोक

    आज भी बहुत कुछ नही बदला, पहाड़ों मै जातिवाद अब भी है इसके लिए हम ही जिमेदार है, हम अपने बच्चों को बताते है की ये वो है और हम बहुत ही अच्छे कुल के है, समाज को बदलना है तो पहले ख़ुद को भी कहीं ना कहीं बदलना पड़ेगा, जिस तरह हिंदू धर्म मे धीरे धीरे एकता की कमी देखी जा रही है ये ही एकमात्र कारण है, समय ke साथ साथ सब कुछ बदलता है उमीद करता हु नई पीढ़ी नये भारत का निर्माण करे, जय हिंद

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