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2 Comments

  1. वीरेंद्र विष्ट

    बहुत गहराई से उकेरा है आपने लोकल और NRP की मनःस्थिति और उनके बीच के सामाजिक सरोकार को।

    पर सभी तथाकथित NRP (या अन्य जगह के प्रवासी) एक जैसे नहीं होते।
    मैं भी एक उत्तराखंडी प्रवासी हूँ और दिल्ली में रहता हूँ। जनम अल्मोड़ा म् हुआ पर पढ़ाई के लिए पिताजी दिल्ली ले आये, माँ भई बहन गांव में थे पहले, बाद में सभी को दिल्ली ले आये पिताजी। कक्षा4 या 5 तक मैं अकेला रहा दिल्ली में, पर हर साल गर्मियों की छुट्टियाँ गांव में बीते, और ईन 2-2 महीनों में गाँव से जितना जुड़ सका, जुड़ा। कुमाऊनीबोली, रीति रिवाज, गीत, आदि। गाय बैल के ग्वाला जाना, मछली पकड़न, गधेरों में बने खाल में तैरण, पेड़ो पँर चढ़ कर कच्चे आम चोरी से खाना और गाली मांगना। सब कुछ तो किया। गांव में जो दोस्त थे वे मेरी छुट्टियों में गांव आने का ििइंतजर करते। पढ़ाई अलग हुई पर कोई भेद नहीं था। बाद में वे सब भी अपने अपने कामों गृहस्थी में रम गए। ज्यादातर वे भी प्रवासी हो गए। अब भी बचपन के उस गांव को ढूढ़ता हुन पर अब वो मिलता नहीं। जो 1 2 दोस्त में हैं उनसे मिलना होता है। पँर अब वे भी बदल गए है या यों कहें अपनी जिंदगि अपनी गृहस्थी, मज़बूरियों में उलझे है और हम अपनी में उलझे हैं। गांव जब भी जाता हूँ तो वो सब तो है नहीं, एक खालीपन और भर जाता है मन में। बस दिल में एक ही इच्छा है कि जिंदगी का आखिरी पड़ाव, चाहे कुछ भी हो, गांव में ही गुजरना है।

  2. Kamlesh

    Excellent . Amaze to see the depth . Kudos . All the best .

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