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5 Comments

  1. singhbalwant438@gmail.com

    असम में जब लड़की की पहली माहवारी आती है तो वो लोग ख़ुशी मनाते है कि उनकी लड़की माँ बनने योग्य है। घर मे दावत करते है गाँव, रिस्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है उनके यहाँ एक रश्म भी होती है।

  2. सुन्दर 'शिक्षार्थी'

    बहुत सटीक विवरण और वैज्ञानिक सन्देश देता लेख । बधाई ।।

  3. Kundan singh matiyali

    भाई साहब एक सिक्के के दो पहलु होते हैं मानता हूँ महिलाओं का सम्मान होना चाहिए लेकिन दूसरी तरफ हम ये ना भूले कि उत्तराखण्ड देव भूमि है जब स्त्री पीरियड में होती है तो शास्त्रों के अनुसार असुद्ध मानी जाती है अगर आप हमारे पहाड़ के बारे में जानते है तो अगर पीरियड के दौरान महिला घर मे सब के साथ रहती है तो कई अनहोनी घटनायें घट जाती है किसी की संस्कृति का मजाक उड़ाना आसान है लेकिन समझना मुश्किल है केदारनाथ त्रासदी इसका एक जीता जागता उदाहरण है ll

  4. Vandana

    आज भी कुछ लोग इन नियमों को मानते हैं क्योंकि वह अपने बड़ों से यही सीखे हैं ,लेकिन साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि पहले के समय में साधनों व सुविधा के आभाव में इस तरह के नियम बनाये गए होंगे, परंतु अब ऐसा नही है, तो सोच को बदलकर प्रकृति के इस नियम को स्वीकारें जिससे महिलाएं व बच्चियां उन कष्टकारी दिनों में सहज रह सकें।

  5. वाणी

    बहुत ही बुरा लगता है जब गाव के बच्चे पूछते है और बीमारी में भी ऐसे ही रहना होता है। पता नहीं कब अंध विश्वास टूटेगा।

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