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6 Comments

  1. [email protected]

    असम में जब लड़की की पहली माहवारी आती है तो वो लोग ख़ुशी मनाते है कि उनकी लड़की माँ बनने योग्य है। घर मे दावत करते है गाँव, रिस्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है उनके यहाँ एक रश्म भी होती है।

  2. सुन्दर 'शिक्षार्थी'

    बहुत सटीक विवरण और वैज्ञानिक सन्देश देता लेख । बधाई ।।

  3. Kundan singh matiyali

    भाई साहब एक सिक्के के दो पहलु होते हैं मानता हूँ महिलाओं का सम्मान होना चाहिए लेकिन दूसरी तरफ हम ये ना भूले कि उत्तराखण्ड देव भूमि है जब स्त्री पीरियड में होती है तो शास्त्रों के अनुसार असुद्ध मानी जाती है अगर आप हमारे पहाड़ के बारे में जानते है तो अगर पीरियड के दौरान महिला घर मे सब के साथ रहती है तो कई अनहोनी घटनायें घट जाती है किसी की संस्कृति का मजाक उड़ाना आसान है लेकिन समझना मुश्किल है केदारनाथ त्रासदी इसका एक जीता जागता उदाहरण है ll

  4. Vandana

    आज भी कुछ लोग इन नियमों को मानते हैं क्योंकि वह अपने बड़ों से यही सीखे हैं ,लेकिन साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि पहले के समय में साधनों व सुविधा के आभाव में इस तरह के नियम बनाये गए होंगे, परंतु अब ऐसा नही है, तो सोच को बदलकर प्रकृति के इस नियम को स्वीकारें जिससे महिलाएं व बच्चियां उन कष्टकारी दिनों में सहज रह सकें।

  5. वाणी

    बहुत ही बुरा लगता है जब गाव के बच्चे पूछते है और बीमारी में भी ऐसे ही रहना होता है। पता नहीं कब अंध विश्वास टूटेगा।

  6. तारा पाठक

    आदरणीया नीलम ‘नील’जी आपका उत्कृष्ट आलेख पढ़कर चार दशक पीछे का गाँव आँखों के आगे साकार हो उठा।उस काल की महिलाओं की समस्या को आपने शब्दों से उकेरा।आपने लिखा है कि _”पहली बार मासिक धर्म होने पर किशोरी के लिए यह दिन एक उत्सव या त्योंहार की तरह मनाया जाना चाहिए।”यदि ऐसा होता तो कितना अच्छा होता उन मासूम कलियों के लिए जो कि खिलने की ओर अग्रसर हैं लेकिन इस शारीरिक परिवर्तन से वे अंदर ही अंदर कुम्हला जाती हैं।
    यहां पर तमिलनाडु और उड़ीसा में मनाए जाने वाले इसी प्रकार के उत्सव के बारे में संक्षिप्त विवरण दे रही हूंँ_
    तमिलनाडु में लड़की की प्रथम माहवारी को उत्सव के तौर पर मनाया जाता है जिसे ‘मंजल निरातु’ विजा नाम से जाना जाता है,इसको मनाने का यह संकेत है कि लड़की अब महिला होने की ओर अग्रसर है। निमंत्रण पत्र से सभी को आमंत्रित किया जाता है।परिवारजन एवं रिश्तेदार सभी इस उत्सव में भाग लेते हैं।लड़की के चाचा नारियल , आम एवं नीम के पत्तों से झोपड़ी बनाते हैं।जिसे कुदिसाई कहते हैं।इस झोपड़ी के अंदर स्वादिष्ट खाने की वस्तुएं रखी जाती हैं।और एक धातु की झाड़ू रखी जाती है जिससे झोपड़ी को झाड़ा जाता है।
    इस उपलक्ष्य पर लड़की को रेशम की साड़ी एवं गहने पहनने को दिए जाते हैं। दुल्हन जैसा सजाया जाता है एवं बहुत सारे उपहार दिए जाते हैं।मंजल निरातु विजा त्योंहार ‘पुण्य धनम’ से खत्म किया जाता है।९वें_११वें एवं १५वें दिन पर पूजा विधि पूरी की जाती है इसके पश्चात चाचा द्वारा यह झोपड़ी तोड़ दी जाती है। इसके बाद पंडित जी द्वारा छोटी सी पूजा की जाती है।
    इसके इतर उड़ीसा में माहवारी का वार्षिक उत्सव मनाया जाता है ।चार दिन तक चलने वाले इस उत्सव को ‘राजपर्व’ नाम से जाना जाता है।चार दिन के इस उत्सव के पहले दिन को पहीलि रजो, दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति, तीसरे दिन को भूदाहा या बासी रजा और आखिरी चौथे दिन को बासुमति स्नान नाम से जाना जाता है।इस उत्सव की यह खासियत है कि इसमें वहीं महिलाएं भाग लेती हैं जोकि इस दौरान मासिक चक्र के दौर से गुजर रही होती हैं।वैसे अन्य महिलाएं भी भाग लें तो मनाही नहीं होती है।

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