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One Comment

  1. ज्ञानेन्द्र पाण्डेय

    पहले पहाड़ की पहचान , “बेडू पाको बारामासा नरेन काफल पाको चैता ” जैसे कुमाऊनी लोक गीत से अधिक होती थी , अबैसा लगता है “काफल ट्री” ने यह जिम्मेदारी ले ली है . बदलते सन्दर्भों में यह एक अर्थपरक पहचान भी लगती है क्योंकि काफल के पेड़ से भी कहीं न कहीं एक मजदूर की भी पहचान होती है . काफल तोड़ कर लाने और बेचने का काम तो यही मजदूर ही करता है .

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