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2 Comments

  1. देवेन्द्र

    पहले तो जाति भेद, फिर जातिगत वर्गभेद, फिर सामाजिक उन्नति के आधार पर इन भेदों का सिमटते जाना, किस बात का द्योतक है?
    शिक्षा का प्रसार, आर्थिक सुदृढ़ीकरण, वैश्विकीकरण। क्या हम भविष्य में एक जातिविहीन, धर्म विहीन, रंग विहीन समाज की कल्पना कर सकते हैं?

  2. Ravi Kant

    जातिगत भेदभाव ने ही गढ़वाल का छतियानाश कर के रखा है।जो हथियार , औजार और हल का निर्माण करते हैं, जो आपके घरों का निर्माण करते हैं , जो आप लोगों के शादी-ब्याह में गीत संगीत कार्यक्रम करते हैं उन्हें तथाकथित उच्च जाती का समझने वाले मुगल आंकरताओं और अंग्रेज़ों के साथ कोई भेदभाव नहीं। कई तथाकथित उच्च जातीय वर्गो की संतान उन निर्दोष जन जिनको आपने समाज के सबसे निचले पायदान पर रखा का श्राप कई सदियो तक झेलना पड़ सकता है।आज पूरे उत्तराखंड मे जो मस्जिदों का अंबार लग गया है इसके लिए कौन दोषी है केवल और केवल उच्च जातिगत भेदभाव जिन्होंने अपने हिंदु भाइयों को हमेशा नीच रखा। आपकी पत्रकारिता एक वामपंथी सोच रखती है ।

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