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2 Comments

  1. Anonymous

    बहुत शानदार लिखा है, ललित मोहन रयाल जी आपने ।बेहतरीन अंदाजे बयां के साथ ।आपको पढ़ते पढ़ते जैसे एक बार फिर से पूरी फिल्म देख ली ।मुझे ये फिल्म बेहद पसंद है ।बहुत पहले इस पर एक पोस्ट भी लिखी थी ।……
    मैं भी एक “छोटी सी बात” की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ आप लिखते हैं -“अरुण साहस बटोरकर प्रभा को लंच पर आमंत्रित करता है. नागेश शास्त्री, प्रभा को साथ में लेकर पहुँचता है ” और “निमंत्रण अरुण ने दिया. प्रभा को साथ में लेकर आता है, नागेश “. दरअसल कहानी कुछ यूं है कि प्रभा अरुण के निमंत्रण पर रेस्टोरेंट में आती है नागेश अपने एक मित्र श्याम के साथ पहले ही वहाँ बैठा है वो प्रभा से कहता है- हाये प्रभा ! तुम यहाँ कैसे ? आओ बैठो have some lunch ।
    प्रभा कहती है- no thanku ।मुझे वहाँ जाना है (वो अरुण की तरफ इशारा करती है )
    नागेश कहता है -तो हम भी वहाँ चलते हैं, इसमें क्या है ? और फिर जैसा कि आपने लिखा वो खामख्वाह ही उन दोनों के गले पड़ता है या अरुण के नजरिये से कहें तो कबाब में हड्डी बनता है ।
    खैर इतना सुंदर लिखने के लिए ,यादें ताज़ा करने के लिए एक बार फिर से आभार……संजय कबीर

  2. Anonymous

    आभार, संजय कबीर जी.

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