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2 Comments

  1. सुमित सिंह

    बहुत सारगर्भित तथ्यपरक आलेख। धन्यवाद।

  2. Shyam Singh Rawat

    काठगोदाम तक रेल की शुरुआत कब हुई, इस पर kafaltree.com में दो रिपोर्ट्स प्रकाशित हुई हैं। जिसमें से पहली ‘काठगोदाम का गौरवशाली इतिहास’ में सुधीर कुमार ने बताया है कि ‘1884 में अंग्रेजों ने हल्द्वानी और इसके बाद काठगोदाम तक रेलवे लाइन बिछाई’ (https://www.kafaltree.com/kathgodam-railway-station-ner/)। जबकि इस आलेख ‘कुमाऊँ के बेताज बादशाह सर हेनरी रैमजे’ में डॉ. नागेश कुमार शाह का कहना है कि ‘सन 1871-72 में काठगोदाम में रेल ट्रैक आने के बाद काठगोदाम-नैनीताल के मध्य (सड़क) बनी थी।’

    डॉ. नागेश कुमार लिखते हैं कि ‘कुमाऊँ में बतौर कमिश्नर सर्वप्रथम एडवर्ड गार्डनर’ नियुक्त हुए थे और यह भी कि ‘हल्द्वानी कुमाऊँ के पहले कमिश्नर श्री गार्डनर के समय बहुत मामूली रूप से बसा था।’

    इन दोनों प्रकरणों की ऐतिहासिकता इस प्रकार है―
    एडवर्ड गार्डनर कुमाऊँ में बतौर कमिश्नर नहीं रहा। वह 27 अप्रैल, 1815 को गोरखाओं के आत्म-समर्पण व निष्क्रमण की संधि पर ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर करने के बाद कुछ समय तक यहां का प्रशासक रहा था।

    कुमाऊँ का पहला कमिश्नर जॉर्ज विलियम (जी. डब्लू.) ट्रेल था जिसने सन् 1834 में हल्द्वानी बसाया और फिर मल्ली बमौरी के उत्तर-पूर्वी कोने पर लकड़ी पड़ाव (काठगोदाम) बसाया। ट्रेल ने 1935 में अपना कार्यभार जे. एच. बैटन को सौंपा (कुमाऊँ का इतिहास―यमुना दत्त वैष्णव, पृ―243 )। बैटन ने ही 1852-53 के आसपास कौसानी, बेडनाग, मैगड, डुंगलोट आदि कई स्थानों में चाय के बाग लगवाये। सी. टी. लूसिंग्टन 1845 में तीसरा कुमाऊँ कमिश्नर बना था। जबकि जनरल सर हेनरी रैमजे को 1856 में कुमाऊँ का चौथा कमिश्नर बनाया गया (वही, पृ―251)।

    इस प्रकार 1856 में हेनरी रैमजे द्वारा कुमाऊँ का कमिश्नर का पदभार ग्रहण करने से पहले जॉर्ज विलियम (जी. डब्लू.) ट्रेल, जे. एच. बैटन और सी. टी. लूसिंग्टन कुमाऊँ के कमिश्नर हो चुके थे।

    24 अप्रैल, 1884 के दिन बरेली से पहली ट्रेन हल्द्वानी पहुंची थी। इसके अगले साल यानी 1885 में काठगोदाम तक रेल लाइन पहुंचाई गई थी। जिसे शिमला व दार्जिलिंग की तर्ज पर मेजर जनरल सीएम. थॉमसन द्वारा रानीबाग, दोगांव, गजरीकोट, ज्योलीकोट, बेलुआखान होते हुए नैनीताल तक ‘माउंटेन ट्रेन’ पहुंचाने की योजना बनाई गई थी। इसके तहत खुर्पाताल में रेल की पटरियां बनाने के लिए लोहा गलाने का कारखाना खोल दिया गया था लेकिन इस पहाड़ की कमजोर भू-संरचना के कारण योजना स्थगित कर दी गई।

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