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4 Comments

  1. यादवेन्द्र

    अल्मोड़ा बाजार की गली में गर्मागर्म जलेबी की दुकान हुआ करती थी।मैंने गंगोलीहाट आते जाते कई बार वहाँ जलेबियाँ खाई हैं।अब वह दुकान है या नही?
    यादवेन्द्र / पटना

  2. RS Manral

    सुंदर लेख कांफल ट्री डाट काम की विशेषता बन गई है।👌💐😊 हार्दिक शुभकामनाएं.👌💐 अल्मोड़ा में मिश्रित भोजन प्रणाली आधुनिकता की देन है।👍💐😊 अल्मोड़ा में खाने के बाद मीठा खाने का रिवाज है।👍 बाल मिठाई, सिंगोड़ी (पतकुच) या चाकलेट प्रायः सभी घरों तक में मिल जाते हैं।👍💐 भोजन के साथ विभिन्न आचार भी टपकिए के ही सहचर हैं।👌💐 टप से उठाकर टपकिया नहीं खाया तो भोजन अधूरा है।👍💐😊

  3. राजेश साह

    शानदार वर्णन। पढ़ते हुए लगता है कि आप अल्मोड़ा की गलियों में घूम रहे हों। साधुवाद।

  4. Kamlesh bagdwal

    पहाड़ी भोजन के पृष्ठ तनाव तथा टपकी के मानवीकरण के इस अद्भुत लेख की प्रशंसा हेतु शब्द नहीं मिल रहे………..

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