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3 Comments

  1. हेमा

    अपना नैनीताल और समय याद आ गया । लाइब्रेरी जाना ,जहाँ बच्चों के लिए खुले में पेड़ों के चारों ओर पुस्तकें फैला दी जाती थीं। लकड़ी की रंग बिरंगी फोल्डिंग कुर्सियां होती थीं। बड़े लोग जब भीतर वाचनालय में पढ़ते थे तो बच्चे बाहर की लाइब्रेरी में किताबें पढ़ अथवा पलट रहे होते। पढ़ने के संस्कार ये बड़े हमें ऐसे ही दे ग ए। नारायण एंड को के साथ ही मार्डन बुक डिपो से भी किताबें और पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ना भी सिखाया गया। कंसल में तब शायद केवल स्टेशनरी मिला करती थी शायद । बहुत सारी यादें हैं । जिनमें किशोरावस्था में लाइब्रेरी से पुस्तकें लेते समय तत्कालीन लाइब्रेरियन का एक डायलोग भी याद आ गया । तब रानू,गुलशन नंदा,दत्ता,इब्ने शफीवगैरह को इशयू कराने जाओ तो वे पूछते थे —“बाबू कब आ रहे हैं ?बहुत दिनों से नहीं आए ।”सुनाते हुए किताबें मेज के सामने के हिस्से में डाल दी जातीं। वहाँ से कोई अच्छी साहित्यिक पुस्तक पकड़ा दी जाती।
    हमारा नैनीताल भी इतना बदल.गया क्या कि लोग किताबें नहीं पलटते?वैसे क्या वह बच्चा लाइब्रेरी फिर से शुरु नहीं की जा सकती?

  2. Pankaj

    Do write something about Himanshu Joshi ji and his epic novel Tumhare liye.

  3. कवीन्द्र तिवारी

    मैंने कई बार यहां से किताबें खरीदी हैं,विभिन्न प्रकार की किताबों का अच्छा कलेक्शन यहां रहता है,पर धीरे धीरे पढ़ने की आदत खत्म होती जा रही है,युवाओं को किताबें ज्यादा नहीं लुभा पा रहीं आज कल।

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