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2 Comments

  1. विकास नैनवाल

    जानकारी से भरा रोचक आलेख। सही कहा बिना मलतब के रस्म ढोने का कोई औचित्य नहीं है।

  2. Deepti Mehra

    ये रीति रिवाज आज भी ऐसेही निभाए जाते हैं. मैं मुंबई शहर की 300 से ज़्यादा शादी मे ये रीति रिवाज देख चुकी हूँ. आपके इस आलेख को पढ़ कर सब जीवंत हो उठा धन्यवाद आज कल के दौर मे एक और चीज़ है जिसका उल्लेख करना ज़रूरी सा लगता है की अपने समाज के प्रवासी उत्तराखंडी जो अपने गावों से डोर वार वधू की तलाश करते हैं उनके लिए ऑनलाइन ढूँढना सरल हुआ हैं. उन्ही मे से एक पोर्टल है https://byohbaraat.com जहाँ पर 20 हज़ार से ज़्यादा लोग फ्री मे रिजिस्टर हैं और सबका डीटेल्स उपलब्ध है.शायद अपनी ख़तम हो रही संस्कृति को बचाने मे ऐसे वेबसाइट आगे आ रहे हैं जो प्रवास मे भी अपने समाज को एक मंच पर ला रहे हैं जिससे अपनी अगली पीढ़ी बची रहे और देसी ना हो जाए.

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