Related Articles

One Comment

  1. गोपू बिष्ट

    भौत बढ़िया पोस्ट लिखी राखी…..सुंदर अति सुंदर।
    पौष माह के इतवारों और माघ महीने में यहाँ काफी भक्त जन आते हैं दूर दूर व आस पास के गांवो से। यहाँ के बारे में एक कहावत यह भी है कि पहले यहाँ बीच जंगल में सोने के दैवीय नौले(पानी के जल श्रोत) हुआ करते थे, ऊंचाई में होने के बावजूद यहाँ पर हमेशा बर्फ जमी रहती थी, पानी के लिये वे ही दैवीय नौले थे जिनसे जंगली जानवर यहाँ पर अपनी प्यास बुझाते थे।
    आस पास के गाँव वालों के पालतू जानवर भी जब जंगल आते थे घास चरने तो वो घर लौटने के बाद पानी नहीं पीते थे, तो एक बार एक ग्रामीण को शक हुआ और वो उस दिन खुद अपने जानवरों के साथ लगा रहा तब उसने देखा कि जंगल के बीचों बीच पानी के नौले हैं और सभी जानवर अपनी प्यास वहीं पर बुझाते हैं। वो आदमी घर आया और उसने इसकी सुचना अन्य ग्रामीणों को दी। तो सभी ग्रामीण फावड़ा, सब्बल, हथौड़ा कुदाल लेकर उधर चले गए….पर वहाँ जाकर देखा तो वो देवीय नौले गायब थे। आज भी वहाँ पर जब भी कोई काम काज होता है तो पीने के पानी को ढोया जाता है। जाड़ो में तो बर्फ पीघला कर पानी तैयार किया जाता है, बर्फ पिघला कर पानी मैंने भी स्वयम पिया है…..एक बार के माघ महीने मे, तब एक बाबा हुआ करते थे वो वहाँ से बिना भोजन खिलाये नहीं जाने देते थे….हम लोगों ने खिचड़ी खाई थी, और भांग की चटनी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

2019©Kafal Tree. All rights reserved.
Developed by Kafal Tree Foundation