Related Articles

4 Comments

  1. Devendra Kotliya

    स्वत्रन्त्रता आन्दोलन में उत्तराखंड की उल्लेखनीय भूमिकाओं के सम्बन्ध में जानकारियाँ एकत्रित करने और प्रकाशित करने का यह प्रमोद साह जी का प्रयास केवल सराहनीय ही नहीं, वन्दनीय है| हम उत्तराखंड वासियों को अपने क्षेत्र के उन वीरों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होनें अंग्रेजों के शोषण, दमन और अत्याचारों के विरुद्ध न केवल आवाज उठाई, बल्कि अपने प्राणों का उत्सर्ग करने से नहीं चुके|
    आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले, और इस संघर्ष में अपना जीवन लगाने वाले सभी वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तो या होगी कि हम इस स्वतंत्रता के वास्तविक मूल्य को समझें, उसे संरक्षित करें| आजादी तभी सुरक्षित रह सकती है जब हरेक पीढ़ी उसका मूल्य चुकाए| जो पीढ़ी स्वतंत्रा का मूल्य नहीं चुकाती, वह या तो स्वयं परतंत्र हो जाती है, अन्यथा अपनी अगली पीढ़ी को परतंत्र होने की स्थिति में ला कर खड़ा करने की अपराधी बन जाती है| हमें अपनी वर्तमान पीढ़ी, जिसमें हम सब सम्मिलित हैं, को इस बात के लिए तैयार करना होगा, कि यदि हमने समय रहते अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ देश की अखण्डता, एकता, सद्भाव, न्यायप्रियता, समानता, धार्मिक सहिष्णुता, मानवीय गरिमा, सर्वधर्मसमभाव की परम्पराओं और मूल्यों को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष नहीं किया तो निश्चित रूप से हम अपने पूर्वजों के बलिदान को व्यर्थ व निर्मूल सिद्ध करने का पाप करने जा रहे हैं|
    (देवेन्द्र कोटलिया)

  2. Pramod sah

    आभार श्री देवेंद्र कोटलिया जी…।

  3. Anonymous

    श्री प्रमोद साह प्रतिभावान लेखक व विचारक हैं। उन्हें नियमित प्रकाशित कर हमें लाभान्वित करते रहें।

  4. श्यामसिंह रावत

    मैं स्वयं 1857 के स्वतंत्रता सेनानी कालूसिंह महर जी के गांव कर्णकरायत अनेक बार गया हूं। जहां मुझे ग्रामीणों ने बताया था कि कालूसिंह जी की गिरफ्तारी के वारंट जारी होने पर वे कभी-कभी अपने गांव के सामने वाले घने बाज के जंगल या गांव के ऊपर स्थित कथित ‘बाणासुर के किले’ में छिप जाया करते थे। उनको कुटिल अंग्रेजों ने एक खतरनाक गुंडा प्रचारित करके अपने कुछ चाटुकारों को उनकी जासूसी पर लगाया हुआ था। उन्हीं के माध्यम से कालूसिंह जी को जंगल से गांव में धोखे से बुलाया गया। जैसे ही वे जंगल और गांव के बीच बहने वाले गधेरे के निकट पहुंचे, उन पर घात लगाकर अचानक हमला कर दिया गया। जिसमें वे शहीद हो गये।
    अब लेखक को यह जानकारी कहां से प्राप्त हुई कि कालूसिंह महर को आजीवन कारावास हुआ? संभवत: उनके पास इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण हो।

    बहरहाल, आलेख अच्छी जानकारी देता है और सपादन की त्रुटियो के बावजूद लेखक का श्रम स्तुत्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

2019©Kafal Tree. All rights reserved.
Developed by Kafal Tree Foundation