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5 Comments

  1. Anonymous

    भाई साहब कालम हमारे समाज की गहरी पड़ताल है।दिनेश जी की क़िस्सागोई के नए रूप व्यंजनाधर्मी भाषा का मिज़ाज और ज़िंदगी को खोजने निकले अलमस्त क़लमनबीस के मन की आँख,वाह,कमाल!

  2. Anonymous

    वाह! वैसे इस लेख को पढ़कर कई बार लगा कि शायद मुझ पर ही लिखा गया है। लेकिन ये सच है कि मैं ऐसा नही हूँ। या शायद हूँ भी। पर अपने आलावा भी कई और लोगों के चेहरे साफ साफ नजर आ रहे हैं।

  3. Anonymous

    बहुत खूब। साधुवाद

  4. Anonymous

    बहुत सुन्दर सर

  5. Anonymous

    बहुत सुंदर।

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